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  • sandeep kumar verma

Subtle signs of communications.

Photo by Anna Shvets on Pexels.com

https://psiloveyou.xyz/31-subtle-ways-people-show-you-who-they-really-are-and-why-you-should-believe-them-96b352436c11?source=userActivityShare-7351677b22bf-1604893071

please read the above post on medium, as it may help you live a better material life. Then you may like to know how to live better so as to enrich your spiritual journey too.

I may have done many of these acts, but never paid attention to actually what message I am giving through these signs. I may have faced many of such signs but failed to understand them too.

Still I strongly trust that ‘How purely/heart fully I behaved, loved and served others in my life is all mattered actually, as that shaped me what I am today. I have to chisel out best of me.

A feeling of compassion arises in me seeing such people. They have no option to leave themselves for life!&I am lucky at least only few moments, days or years is what matters me to bear with them. Then I am again free. It is my life, the other is not at all matters in it – leave alone his behaviour, grudges, sabotages etc.

Plus, I realised recently only, life is a river that flows between two shores ie material progress ie mind driven and spiritual progress ie heart controlled. Whenever I got setback in material world it is because I got too astray in spiritual world and God wanted me to put me again on its right track. So to harm me in material world someone is needed for sure. I have compassion towards all those because God choose only those for harming others who do not have any spark of spirituality. Most of them are my friends and relatives or at least known persons.

Today I gained a lot in my spiritual journey and it is life long learning. It helps in sleeping every day like a child, after he/she learned new word in that day, with contentment or sense of achievement. This is bliss and no one can steal it from me. If i share it, it increases many fold.

So yes, these signs helps one in growing material world, but I suggest not to pay much or undue attention on others but instead on self in life, you have to live with yourself whole life!

Awareness meditation is the way worked for me, may be you too find it suitable otherwise Dynamic meditation is for most of the people. There are 110 other meditation techniques discovered by Indian Mystic Gorakhnath about 500years before and further modified by Osho that one can experiment and the suitable one could be practiced in routine life.

Osho International Online (OIO) provides facility to learn these from your home,

1. through Osho Meditation Day @€20.00 per person. OIO rotate times through three timezones NY,Berlin and Mumbai. You can prebook according to the convenient time for you.

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3. There is a 7 days Free Trial also for people who would like to first try it out.

This is an opportunity for learning and knowing Osho through these sannyasins who lived in his presence and brought to life his words in best possible quality in all formats.

Disciples of Jesus left him alone in last minutes but Osho’s disciples remained with him till he left his body willingly after working, till last day, for all of us to get enlightened. Jesus tried hard till last minute, before being caught, to teach meditation to his disciples. As per Saint John’s Gospel:- Jesus used word ‘Sit’ to transfer his meditative energy to them and went on to pray God, but on returning he found them sleeping. He tried two times again but in vain.

Even today Zen people use word ‘Sit’ for meditation in their saying ‘Sit silently, do nothing, season comes and the grass grows by itself green’.

Hi ….. I write my comments from my personal experiences of my inner journey. This post may include teachings of Mystics around the world that I found worth following even today. For more about me and to connect with me on social media platforms, have a look at my linktree website for connecting with my social media links, or subscribe my YouTube channel and/or listen to the podcasts etc.

पउड़ी: 6 : जपुजी साहिब

तीरथि नावा जे तिसु भावा, विणु भाणे कि नाइ करी।

लोग तीर्थ जा रहे हैं, स्नान कर रहे हैं, इस स्नान में कोई उत्सव नहीं है। केवल पापों से छुटकारे की आकांक्षा है।जो बुरा किया है, सोचते हैं, गंगा में स्नान से बह जाएगा। लेकिन बुरा तुमने किया है, और गंगा में स्नान से कैसेबह जाएगा? गंगा का दोष क्या है तुम्हारी बुराई में? बुरा तुम करोगे, गंगा किस लिए धोने को बहती रहेगी? औरबुराई तुमने जो की है, वह शरीर की तो नहीं है, चेतना की है। गंगा का पानी उस चेतना को छू भी कैसे पाएगा?

… पुरानी कथा है कि एक गंगा तो जमीन पर बहती है और एक गंगा स्वर्ग में। तुम्हें स्वर्ग की गंगा खोजनीपड़ेगी। क्योंकि पृथ्वी की गंगा शरीर को छुएगी, पृथ्वी की है, शरीर तक उसकी पहुंच है। स्वर्ग की गंगा तुम्हेंछुएगी, तुम्हें धो देगी। लेकिन स्वर्ग की गंगा तुम कैसे खोजोगे? कहां खोजोगे? ये सूत्र स्वर्ग की गंगा की खोजके लिए कहे गए हैं।

नानक कहते हैं:

तीरथि नावा जे तिसु भावा,

‘यदि मैं उसको भा गया, तो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।’

उसको भा जाना स्वर्ग की गंगा को खोज लेना है। उसको भा जाना बड़ा गहरा सूत्र है। इसे समझने की थोड़ीकोशिश करो। एक तो तुम उसे भाओगे तभी, जब तुम उसके विरोध में नहीं खड़े हो। तुम उसे भाओगे तभी, जबतुमने सब भांति अपने को उसमें लीन कर दिया है। तुम उसे भाओगे तभी, जब तुम्हारा कर्ता-भाव मिट गया है।परमात्मा कर्ता है, तुम निमित्त हो। बस! तुम भा जाओगे।

गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

तू बीच में मत आ। तू अपनी तरफ से चुनाव मत कर। तू विचार मत कर कि क्या ठीक है और क्या गलत है। तू जानेगा भी कैसे कि क्या ठीक है और क्या गलत है? तेरे देखने की सीमा कितनी? तेरी समझ कितनी? तेरा अनुभव कितना? तेरा होश कितना? तू इस छोटे से दीए से देखने की कोशिश मत कर, इसकी रोशनी चार फीट से ज्यादा दूर नहीं पड़ती। और जीवन का विस्तार अनंत है। वह तुझसे जो करवा रहा है तू कर। तू बीच में मत खड़ा हो। तू सिर्फ माध्यम बन जा। जैसे बांसुरी से कोई गीत गाए और बांसुरी केवल राह दे, ऐसी तू राह दे। निमित्त हो जा। जो निमित्त हो गया वह उसका प्यारा हो गया। जो कर्ता बना रहा वह दुश्मन बना रहा। उसका प्रेम तो फिर भी बरसता रहेगा, क्योंकि उसका प्रेम बेशर्त है। तुम क्या हो, इससे कोई संबंध नहीं। लेकिन तुम ही उसे पाने में असमर्थ हो जाओगे। जैसे घड़ा सीधा रखा हो और वर्षा हो रही हो तो भर जाएगा। वर्षा तो होती ही रहेगी, घड़ा उलटा रखा है तो खाली रह जाएगा। वर्षा तो उलटे घड़े पर भी होती रहेगी, क्योंकि वर्षा तो बेशर्त है।

उसका प्रेम किसी शर्त से बंधा नहीं है कि तुम ऐसे हो जाओ तो मैं प्रेम करूंगा। इसे भी समझ लेना।

नानक का यह वचन सुनकर कई लोगों को लगेगा कि मैं ऐसा हो जाऊं तो वह मुझे प्रेम करेगा। नहीं, उसका प्रेम तो बरस ही रहा है। अगर उसके प्रेम में भी शर्त हो तो मनुष्य और परमात्मा के प्रेम में कोई अंतर न रह जाए।

यही तो मनुष्य के प्रेम की पीड़ा है कि हम कहते हैं, तुम ऐसा करोगे तो मैं प्रेम करूंगा, तुम ऐसे होओगे तो मैं प्रेम करूंगा। मेरी शर्तें पूरी करोगे तो मैं प्रेम करूंगा, अन्यथा मैं प्रेम खींच लूंगा। बाप बेटे से यही कह रहा है, पत्नी पति से यही कह रही है, मित्र मित्र से यही कह रहा है कि तुम ऐसा करो। अगर तुम ऐसा किए तो मुझे जंचोगे।

इस कारण, इस प्रेम के अनुभव के कारण, तुम यह मत सोच लेना कि नानक यह कह रहे हैं कि परमात्मा तुम्हें तब प्रेम करेगा जब तुम कुछ शर्तें पूरी करोगे। नहीं, उसका प्रेम तो बरस रहा है। शर्तें पूरी करोगे तो तुम सीधे घड़े की भांति हो जाओगे। उसकी वर्षा हो रही है, भर जाएगी। तुम लबालब हो जाओगे। तुम बहने लगोगे भर कर। न केवल उसका प्रेम तुम्हें मिलेगा, तुमसे औरों को भी मिलने लगेगा। गुरु हम उसी को कहते हैं कि जिसका घड़ा इतना भर गया परमात्मा के प्रेम से कि अब समाता नहीं। वही औरों के घड़ों पर भी बहने लगा।

गुरु का मतलब ही इतना है कि जिसकी अपनी जरूरत पूरी हो गई। जिसकी चाह बुझ गई। जिसकी तृष्णा शांत हो गई। जिसका घड़ा इतना भर गया कि अब वह देने में समर्थ है। अब वह न दे तो क्या करे? जैसे बादल जब भर जाए पानी से तो बरसेगा, हलका होगा। जब फूल भर जाए गंध से तो गंध बिखरेगी। ऐसे ही जब तुम्हारा घड़ा भर जाएगा उसके प्रेम से, तुम्हारे चारों तरफ बंटने लगेगा, बहेगा। और उसकी वर्षा का तो कोई अंत नहीं।

एक बार तुम्हें पता चल जाए कि सीधे होने से भरना शुरू हो जाता है, वह वर्षा तो होती ही रहती है, तुम कितना ही उलीचो। हजार हाथ से उलीचो तो भी उलीच न पाओगे।

तो यह खयाल रखना कि नानक जब यह कह रहे हैं, तो उनका प्रयोजन तुमसे है। ‘यदि मैं उसको भा गया, तो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।’ उसको तो तुम भाए ही हुए हो, अन्यथा तुम होते कैसे? अगर वह एक क्षण को भी न चाहता तुम्हारा होना, तो तुम तिरोहित हो जाते। तुम्हारी श्वास-श्वास में वही है। तुम्हारी हर धड़कन में वही है। अस्तित्व ने तुम्हें चाहा है। अस्तित्व ने तुम्हें प्यार किया है। अस्तित्व ने तुम्हें बनाया है। तुम कैसे हो, इसकी फिक्र नहीं है, अस्तित्व तुम्हें अभी भी जीवन दे रहा है। उसे तुम तो भाए ही हुए हो। लेकिन तुम उलटे खड़े हो।

Jesus: Jesus too says similar words when his authority was challenged, in my blog post ‘How an enlightened person become an authority?’ I have described it in details.

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Even today Zen people use word ‘Sit’ for meditation in their saying ‘Sit silently, do nothing, season comes and the grass grows by itself green’.

Hi ….. I write my comments from my personal experiences of my inner journey. This post may include teachings of Mystics around the world that I found worth following even today. For more about me and to connect with me on social media platforms, have a look at my linktree website for connecting with my social media links, or subscribe my YouTube channel and/or listen to the podcasts etc.

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