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  • sandeep kumar verma

बीज की यात्रा सुगन्ध के रूप में अदृश्य हो जाने की

प्रेम ज्ञान है। एकमात्र ज्ञान प्रेम ही है। बाकी सब जानना ऊपर-ऊपर है। क्योंकि ऐसा और कोई भी जानना नहीं है जिसमें जानने वाले को मिटना पड़ता हो। वह प्रेम की पहली शर्त है: मिट जाना, खो जाना।

जन्म होता है, मृत्यु होती है। सभी का जन्म होता है, सभी की मृत्यु होती है। जन्म और मृत्यु के बीच जो व्यक्ति प्रेम से परिचित हो जाता है, वह अमृत को उपलब्ध हो जाता है।

इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग।।

परमात्मा की जाति प्रेम; परमात्मा की देह प्रेम; परमात्मा की आत्मा, अस्तित्व प्रेम; परमात्मा का ढंग, होने का रंग, रूप-रेखा प्रेम।

जीसस का यह वचन कि परमात्मा प्रेम है, बहुत गहरे में खोजने जैसा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि परमात्मा प्रेमी है। इसका यह अर्थ नहीं कि परमात्मा करुणावान है। इसका यह अर्थ नहीं कि परमात्मा दयावान है। जैसा कि बहुत से ईसाइयों ने इसका अर्थ किया है। अगर ऐसा ही कहना होता जीसस को तो वे कहते: परमात्मा प्रेमी है, परमात्मा महाकारुणिक है, परमात्मा दयावान है। पर उन्होंने ऐसा नहीं कहा। उन्होंने कहा, परमात्मा प्रेम है। प्रेमी नहीं, दयावान नहीं, करुणावान नहीं; सिर्फ प्रेम है। परमात्मा का सारा रूप व्यक्तित्व का नहीं है, ऊर्जा का है। प्रेम ऊर्जा है; शुद्ध शक्ति है; शुद्धतम शक्ति है। वह श्रेष्ठतम है, अंतिम है।

जैसे बीज को हम बोते हैं, वह पहला चरण है। वृक्ष होता है, वह दूसरा चरण। (इस लिंक से आप एक ऐनिमेशन के माध्यम से इस यात्रा को YouTube पर देख सकते हैं) फूल लगते हैं, वह तीसरा चरण। फिर सुवास आकाश में उड़ जाती है, वह चौथा चरण। प्रेम सुवास है। बीज कामवासना के हैं। प्रेम आखिरी घटना है। उसके पार फिर कुछ भी नहीं है। बीज का तो रूप है; सुवास का कोई रूप है? बीज का तो पता-ठिकाना है; सुगंध का कोई पता-ठिकाना है? बीज को तो तुम पकड़ लोगे। वृक्ष को भी पकड़ लोगे। फूल को भी मुट्ठी में ले सकते हो। लेकिन सुवास का क्या करोगे? मुट्ठी बांधोगे तो मुट्ठी में सुवास न रह जाएगी।

प्रेम को कोई बांध नहीं सकता। और जिसने भी प्रेम को बांधने की कोशिश की, उसके हाथ में कूड़ा-करकट लगेगा। सुवास को बांधने का यह ढंग नहीं। सुवास के साथ तो स्वयं जो उड़ जाए; सुवास के साथ तो स्वयं जो लीन हो जाए; सुवास के अंतहीन, आकारहीन अस्तित्व के साथ जो अपनी एकता साध ले; गिर जाए बूंद की भांति सागर में, वही जान पाएगा। जो सुवास हो जाए वही जान पाएगा।

स्वभावतः जरूर कोई बड़ी बाधा होगी कि इतने लोग जन्मते हैं, बहुत कम लोग प्रेम को जान पाते हैं। इतने लोग मरते हैं, बिना प्रेम को जाने मर जाते हैं। कोई गहरी बाधा होनी चाहिए। बाधा है। उसे हम ठीक से समझ लें तो फिर ये सूत्र समझ में आ जाएंगे।

कामवासना प्रेम की निम्नतम दशा है। है तो प्रेम की ही, पर बड़ी सीमाओं में बंधी है, क्षुद्र से घिरी है। कामवासना का अर्थ है: शरीर का शरीर के प्रति आकर्षण। स्वभावतः कामवासना पृथ्वी की है; बहुत स्थूल है। उसमें बास भूमि की है। वह मिट्टी से ही पैदा हुई है और मिट्टी में ही गिर जाएगी। मिट्टी से ऊपर उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

फिर जीवन में जिसे हम साधारणतः प्रेम कहते हैं, वह है। उसको प्रेम दादू नहीं कहते, हम उसे प्रेम कहते हैं। वह प्रेम है दो मनों का आकर्षण। शरीर से ऊपर है। थोड़ी यात्रा ऊपर उठी। थोड़ी सीढ़ी पर ऊपर चढ़े। जो इतने प्रेम को भी उपलब्ध हो जाए वह भी धन्यभागी है।

अधिक लोग तो शरीर पर ही समाप्त हो जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता कि शरीर से और भी ऊंचाइयां थीं, और भी गहराइयां थीं। उन्हें यह भी पता नहीं चलता कि शरीर तो एक पायदान था। उस पर पैर रखना था, ऊपर उठ जाना था। लेकिन जिनके जीवन में थोड़ी सी प्रेम की झलक आती है, जो शरीर के आकर्षण के कारण नहीं है, जो दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व, उसके मन–शरीर के पार थोड़ा सा उठता है भाव–जिन्होंने यह प्रेम भी जान लिया, उनको एक बात समझ में आ जाती है कि जानने को और भी बाकी हो सकता है। द्वार खुलता है। अब दीवार नहीं रह जाती। जो शरीर पर ही समाप्त हो जाते हैं, उनके लिए सिर्फ दीवार ही रह जाती है।

फिर एक तीसरा और प्रेम है, जिसको भक्तों ने प्रार्थना कहा है। जब दो शरीर के बीच आकर्षण होता है तो काम; जब दो मनों के बीच आकर्षण होता है तो प्रेम–जिसे हम प्रेम कहते हैं; जब दो आत्माओं के बीच आकर्षण होता है तब प्रार्थना; और जब दो बिलकुल खो जाते हैं, दो ही नहीं रह जाते, तब इसक। जिसको दादू प्रेम कहते हैं; जिसको जीसस ने प्रेम कहा है। वह आखिरी ऊंचाई है।

वे सीढ़ियां तुम्हारे भीतर हैं। तुम पहली ही सीढ़ी पर खड़े रह जाओ तो कोई और जिम्मेवार नहीं है। दूसरी सीढ़ी पास ही थी। लेकिन कोई अड़चन होनी चाहिए। कोई गहरी बाधा होनी चाहिए। इतने लोग चूक जाते हैं कि करीब-करीब ऐसा लगता है, चूकना स्वाभाविक है। और इतने कम लोग उपलब्ध हो पाते हैं कि ऐसा लगता है, पाना अपवाद है, नियम नहीं। कोई बुद्ध, कोई चैतन्य, कोई दादू, कोई नानक–कभी करोड़ों लोगों में एक।

बाधा है: मरने का डर। क्योंकि जितनी ऊंचाई पर तुम जाते हो, उतना ही तुम्हारा अहंकार क्षीण होने लगता है, गलने लगता है। जितनी ऊंचाई होगी, उतने ही तुम कम हो जाओगे। यह डर है। जितनी नीचाई होगी, उतने ही तुम रहोगे। ठीक जमीन पर पड़े रहो तो पत्थर की चट्टान की तरह तुम होओगे। स्वभावतः ऊपर उठना हो तो पत्थर की चट्टानें ऊपर नहीं उठतीं; सुगंध उठती है, अग्नि की शिखा उठती है, भाप उठती है। विरल हो जाना पड़ता है। स्वयं को खोना पड़ता है।

कामवासना में कोई खोता नहीं अपने को। कामवासना में तुम तुम रहते हो। तुम दूसरे का उपयोग कर लेते हो। तुम मिटते नहीं, वस्तुतः तुम दूसरे को मिटाने की चेष्टा करते हो।

इसीलिए तो पति-पत्नियों में इतनी कलह है सारे संसार में पूरे मनुष्य-जाति के इतिहास में। हजार तरह से सोचा गया है कि पति-पत्नी की कलह कैसे मिटे। कोई उपाय नहीं दिखता। कलह मिट नहीं सकती, ऐसा लगता है।

जब तक मनुष्य ऊपर न उठना सीखे, कलह नहीं मिट सकती। कलह यही है कि पत्नी पति को मिटाने की चेष्टा कर रही है, पति पत्नी को मिटाने की चेष्टा कर रहा है। एक गहन संघर्ष है, जो चाहे उन्हें ज्ञात भी न हो। पति कोशिश कर रहा है कि मैं सब कुछ हूं, तू मेरी परिधि है। पत्नी भी यही कोशिश कर रही है कि मैं केंद्र हूं, तुम परिधि हो। दोनों के अहंकार अपने को बचाने की चेष्टा में संलग्न हैं। कहीं दूसरा मिटा न दे। इसके पहले कि दूसरा मिटाए, मैं उसे मिटा दूं; यही सुरक्षा का उपाय मालूम पड़ता है।

इसलिए कामवासना प्रेम की तो बड़ी दूर की खबर है, हिंसा की ज्यादा। और अगर ज्ञानियों ने कामवासना से ऊपर उठने को कहा है, तो इसीलिए कहा है। महावीर ने तो स्पष्ट कहा है कि कामवासना हिंसा है। ये जैन शास्त्र अब तक नहीं समझा पाए हैं इस बात को कि कामवासना को हिंसा कहने का अर्थ क्या है? उन्होंने मूढ़तापूर्ण बातें खोज ली हैं, पंडितों ने, कि संभोग करने में कीटाणुओं की हिंसा होती है। क्योंकि दो शरीर का घर्षण होता है, इसलिए कुछ कीटाणु छोटे हवा के मर जाते हैं। इसलिए महावीर ने कामवासना को हिंसा कहा है।

पंडितों से मूढ़ आदमी खोजने मुश्किल हैं। उनके पास आंखें तो नहीं हैं, अंधे हैं। शब्दों के कुछ भी अर्थ तो निकालने ही पड़ेंगे। तो वे अपने अंधेपन से यह अर्थ निकाल लेते हैं। कामवासना को महावीर ने इसलिए हिंसा नहीं कहा है। इसलिए हिंसा कहा है कि जहां भी काम है वहां दूसरे को मिटाने की चेष्टा है। वही हिंसा है। और जब तक काम प्रेम न बन जाए तब तक हिंसा जारी रहेगी। और जब तक काम प्रेम न बन जाए तब तक ब्रह्मचर्य का कोई आविर्भाव न होगा।

तो ब्रह्मचर्य कामवासना का त्याग नहीं है, बल्कि कामवासना के भीतर जो छिपे हुए प्रेम का तत्व है, उसको मुक्त करना है। कामवासना की हत्या नहीं कर देनी है। यह तो ऐसे हुआ जैसे बीज को कुचल कर मार डाला। अब तुम बैठे रहो, सुगंध न आएगी। यद्यपि बीज के रहते भी सुगंध न आ सकती थी। बीज को टूटना था–टूटना था भूमि में; ताकि बीज तो मिट जाए, लेकिन बीज में छिपी हुई जो सुवास है वह मुक्त हो जाए। उसको मुक्त होने पर लंबी यात्रा करनी पड़ेगी। बीज को वृक्ष बनना पड़ेगा, वृक्ष को फूल बनना पड़ेगा, फूल से सुवास मुक्त होगी। लंबी यात्रा है।

लेकिन अगर तुमने पत्थर उठा कर बीज मिटा दिया, जैसा कि बहुत से लोग करते हैं, साधु-संन्यासी करते हैं; उन्होंने कामवासना को पत्थर से मार डाला। अब वे बैठे हैं। ब्रह्मचर्य की कोई गंध नहीं आती। कामवासना मिटा दी और ब्रह्मचर्य की कोई सुगंध नहीं आती। तुम उनके जीवन को बड़े अधर में लटका हुआ पाओगे, त्रिशंकु की भांति पाओगे। न तो वे इस जगत के रहे, न उस जगत के।

तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी की बड़ी दुर्गति है। वे तुमसे भी बुरी स्थिति में हैं। तुम्हारे पास कम से कम बीज है। तुम भला बीज में ही अटके हो, लेकिन अभी भी संभावना है कि बीज को तुम बो दो, अंकुर आ जाए। अभी भी देर नहीं हो गई है। कभी भी देर नहीं हो गई है। जब भी तुम बीज को बो दोगे तभी अंकुर आ जाएगा। लेकिन तुम्हारे साधु-संन्यासी ने तो बीज को तोड़ डाला, इस डर से कि कामवासना में हिंसा है। बीज तो मर गया। उस बीज के साथ ही सुवास की संभावना भी मर गई।

कामवासना के विपरीत नहीं है ब्रह्मचर्य, कामवासना का शुद्धतम रूप है। बीज के विपरीत नहीं है सुगंध, बीज की ही शुद्धतम अभिव्यक्ति है। क्या फर्क है बीज में और सुगंध में? बीज में जो-जो पृथ्वी का अंश था वह पृथ्वी में डूब गया और जो-जो आकाश का अंश था वह सुवास से मुक्त हो गया। तुम्हारे भीतर जो-जो पृथ्वी का अंश है, वह कामवासना के धीरे-धीरे छूटते-छूटते पृथ्वी में लीन हो जाएगा। और तुम्हारे भीतर जो आकाश है–आत्मा कहो, परमात्मा कहो, वह मुक्त हो जाएगा। उसकी कोई जड़ें जमीन में न रह जाएंगी। वह उड़ जाएगा आकाश में। यही मोक्ष है, यही निर्वाण है।

लेकिन मेरी बात ठीक से समझ लेना। मैं ब्रह्मचर्य के पक्ष में हूं और कामवासना के विपक्ष में नहीं हूं। क्योंकि कामवासना के विपक्ष में होते ही ब्रह्मचर्य का तो उपाय ही खो गया। यह तो तुमने सीढ़ी का पहला पायदान ही तोड़ दिया। अब इस पर दूसरे पर तो जाने का उपाय न रहा। तुमने सीढ़ी जला दी। सीढ़ी जला कर तुम ऊपर न पहुंच जाओगे, तुम सीढ़ी से भी नीचे गिर जाओगे।

इसलिए मैं कहता हूं कि जिसने कामवासना को ठीक से समझा नहीं, वह ब्रह्मचर्य को तो नहीं होगा उपलब्ध, नपुंसकता को उपलब्ध हो जाएगा। वह सीढ़ी से भी नीचे गिर जाएगा। अगर सिर्फ नपुंसकता ही परमात्मा को पाने का उपाय होती, तो सभी नपुंसक पा लेते। लेकिन तुमने कभी सुना है किसी नपुंसक को मुक्त होते? कोई इतिहास में उल्लेख है किसी नपुंसक का, जो कि परम ज्ञान को उपलब्ध हुआ हो? वह असंभव है; इसलिए उल्लेख नहीं है। असंभव है इसलिए कि उसके पास बीज ही नहीं है। वह बो नहीं सकता। वह फसल नहीं काट सकता। वह सुगंध को फैला नहीं सकता आकाश में।

कामवासना में बुराई कुछ भी नहीं है, उस पर रुक जाने में बुराई है। कामवासना के पार जाना है। तब तुम उसे भी धन्यवाद दोगे। तब तुम कहोगे, तेरे बिना ऊपर भी न उठ सकते थे। तब तुम्हारा मन वासना के प्रति भी अनुग्रह से भरा होगा; क्रोध से, निंदा से नहीं।