top of page
  • sandeep kumar verma

घर वापसी

भारत में जो ब्राह्मण हैं वे अपने आपको ‘अनपढ़ ब्राह्मण’ मानकर ब्रह्मज्ञान की बजाय बाक़ी सारे काम में कुशल होने को पूर्ण ब्राह्मण होनेकी पहली पायदान मानते हैं।

भारत के सभ्रांत वर्ग ने ब्रह्म ज्ञान जो सबसे महत्वपूर्ण है, उसे तो एक तरफ़ रख दिया और उसको छोड़कर बाक़ी सारे रास्तों पर विश्व गुरुहोने का सपना संजोए है। येन केन प्रकारेन चाहे ज़ोर ज़बरदस्ती और भय से ऐन हिंदू धर्म को बचाने में लगा हुआ है। जबकि मनुष्य सेधर्म है ना कि धर्म से मनुष्य। लाओ त्ज़ु ने कहा है कि जब धर्म में ज़ोर ज़बरदस्ती होने लगे तो यह उसके अंत समय की निशानी है, जैसेदिया बुझने से पहले सभी बचा खुचा तेल एकसाथ खींचकर बड़ी तेज ज्योति का साथ जलता हुआ दिखता है। अभी तक तेल खुद बातीतक चला आता था। मेरे अनुसार यही भारत की संस्कृति और प्रगति के लिए सबसे घातक साबित हुआ। लेकिन संस्कृति के मायने हीबदल दिए गए हैं।

आध्यात्मिक यात्रा और उसके लिए अनुसंधान ताकि नए नए तरीक़े से आज और आने वाली पीढ़ी अपने मनुष्य होने की पराकाष्ठा को पासके। साधारण लोगों के जीवन में आज के जमाने अनुसार नए नए तरीक़े से ऐसे व्यावहारिक बदलाव जिनकी साधारण जीवन में भीज़रूरत हो और जो कोई कभी आध्यात्मिक यात्रा पर निकले तो उसे उसके दूसरे पहलू का भी पता चले और उसे अपने पुरखों पर गर्व होकि अनजाने हो वह कितनी महत्वपूर्ण ज्ञान से अपने जीवन में परिचित हो चुका था। इसे ही संस्कार कहते हैं। और संस्कृति को बचाने केलिए नित नए नए आध्यात्मिक प्रयोग करने होते हैं।

जनता मंदिर के हाथ में। मंदिर गुंडों के हाथ में। गुंडे नेताओं के हाथ में। और नेता धनपतियों के हाथ में। तब कैसी संस्कृति? और कैसासंस्कार?

पश्चिम से जो लिया जा सकता है वह उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। उसको आध्यात्मिक अनुसंधान से जोड़ने पर ही विश्वगुरु होने कीसम्भावना है। ओशो ने अपने काम्यून द्वारा यह करके दिखा दिया लेकिन हम उसे अनदेखा करके बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं। उसमेंसमयानुसर बदलाव कर अपनाना चाहिए। ओशो उपनिषद के माध्यम से पूरा मार्गदर्शन इसके बारे में दिया गया है कि कैसे उसे पूरे विश्वमें फैलाया जा सकता है।

जो हमारी धरोहर है, जिसके लिए पूरी दुनिया हमारे सामने नतमस्तक होती रही है, उसको छोड़कर हमने पश्चिम की तरह खान-पानइत्यादि को अपना लिया यही स्वधर्म को छोड़कर दूसरे का धर्म अपनाना है।

यह तो ऐसा है जैसे अमरीकाScience&technology को छोड़कर oil को अपनी जीविका का साधन बना ले।

लेकिन भारत की संस्कृति के नाम पर व्यवसाय के लिए समर्पित करके व्यक्ति खुद का कितना नुक़सान करता रहा है ( पीढ़ी दर पीढ़ी)इसपर ध्यान देने की ज़रूरत है। ओशो के के बताए मार्ग पर एक एक कदम उठाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, कई विदेशी लोग प्राप्त कर चुके हैं।

पहले जीवन मेंमैंने awareness/mindfulness meditation को सुबह दांत साफ़ करते समय करना प्रारम्भ किया और पारिवारिक ज़िम्मेदारी निभातारहा। संतों के प्रवचन भी सुनता रहा चाहे वह किसी भी धर्म के हों और अपने धर्म की किताब भी पढ़ता रहा । फिर जब भी लगा कि क़रीबक़रीब सारी जिम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी है, क्योंकि पूरी तो कभी नहीं होतीं, तब अपने आपको पूरी तरह से इस अपनी खुद के प्रति ईश्वरद्वारा सौंपी गयी ज़िम्मेदारी के प्रति समर्पित कर दिया। ईश्वर की कृपा और गुरुओं के आशीर्वाद से ही यह सम्भव है क्योंकि कलियुग मेंसंसार में रहकर संसार से विलग होना ही सबसे बड़ी चुनौती है। बाक़ी आसान है, किसी ने meditation या ज्ञान मार्ग से पाया। मेरा दोस्तभक्ति मार्ग पर काफ़ी आगे आ चुका है।

आदमी जिसका निर्माण करता है, उसे वह नष्ट भी कर सकता है और पुनर्निर्माण भी कर सकता है। हम मस्जिद बनाने वाले भी हुए, तोड़नेवाले भी हुए और अब फिर ‘वहीं पर’ मंदिर भी बनाने जा रहे हैं। यह तो चलो अच्छा हुआ लेकिन अब हम खुद पर भी ध्यान दे लेंगे तोअच्छा रहेगा। तो जो अनपढ़ ब्राह्मण का निर्माण करके बैठा है, वही उस धारणा को नष्ट भी कर सकता है और ‘वहीं पर’ असलीब्राह्मणत्व को स्थापित करके मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं। यह सम्भव है। मेरा ब्लॉग philosia.in मेरे अनुभव को लिपिबद्ध किएहुएहैं।

यही असली घर वापसी होगी उसके लिए जो चुनौती को स्वीकार करेगा और ब्रह्म ज्ञान से पहले और कम को स्वीकार नहीं करेगा।क्योंकि वही है हमारा असली घर, और उसी पर वापस लौटने का पूरे जी जान से प्रयत्न तो किया ही जा सकता है। वहीं से यात्रा शुरू हुईथी। मनुष्य उस यात्रा के प्रथम और अंतिम छोर के जोड़ पर स्थित है, जो उस पूरी गोलाकार यात्रा का महत्वपूर्ण बिंदु है। उस प्रथम औरअंतिम बिंदु के जुड़ते ही मनुष्य उसकी परिधि से केंद्र पर ‘गिर जाता’ है, इसे ही गुरु की कृपा या ईश्वर की दया कहा जाता है क्योंकि यहहमारे करने से नहीं होता, ‘हमारे’ न करने से अपनेआप होता है। इसी अनिश्चितता के कारण सभी जो संसार मिका है उसे ही साधने लगतेहै, जैसा कि सभी कर रहे हैं। लेकिन यही माया की पकड़ है जो कोई साधता नहीं दिखता फिर भी उसी में सार नज़र आने लगता है।व्यक्ति अपनेआप को असहाय और कमजोर समझने लगता है क्योंकि ख्वाहिशें बड़ी बड़ी पाल लेता है या समाज के देखादेखी उसकोउनके बग़ैर जीवन व्यर्थ नज़र आने लगता है। इसे ही किसी सूफ़ी संत ने इस प्रकार कहा है:

बुलंद (infinite) होकर भी आदमी, अपनी ख्वाहिशों का ग़ुलाम है।

यह है मयक़दा, यहाँ रिंद हैं, यहाँ सबका साक़ी इमाम है॥

किसी को धन का नशा है, किसी को पद का तो किसी को सुंदरता का लेकिन सब नशे में हैं और उसपर तुर्रा यह कि खुद ईश्वर ने इनकोयह जाम पिला रखा है। लेकिन मनुष्य ईश्वर से बढ़कर है क्योंकि वह उसके इस नशे से मुक्त होकर अपनी बुलंदी को पाकर आपने घरवापस जा सकता है। और यही challenge है उसको ईश्वर का दिया हुआ, कि माया मेरी जाम मेरा और तुझ पर भरोसा और कृपा भीमेरी। तो किसपर भरोसा करे वही तेरे प्रारब्ध का कारण बनेगा।

उसपर यह तो तय है ही कि जहां तक यात्रा होगी अगले जन्म में वहीं से शुरू होगी। यही तो शुभ लाभ है, ब्राह्मणत्व की राह में कोई ख़ालीतो जाता ही नहीं। ‘कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं होता, ‘एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों’॥उ

वाक़ई आप इस आसमान से बाहर हो जाते हैं, ब्रह्मज्ञान कुछ ऐसा ही अनुभव है और यह शेर उसी के लिए लिखा गया है।

ओशो द्वारा सुझाया सहज ध्यान यानी होंश पूर्वक जीना यानी रोज़ के काम में होंश का प्रयोग मेरे जीवन को बदलकर रख गया। अपने आप सहज ही मन सपने देखना कम कर देता है, फिर जब भी सपना शुरू करता है तो विवेकपूर्वक उसका आना दिखाई देने लगता है, और दिखाई दे गया कि फिर बुना नया सपना मन ने-तो फिर रोकना कोई कठिन काम नहीं है। मैंने इसे ओशो की एक किताब से सीखा और जीवन में सुबह ब्रश करते समय प्रयोग करके साधा।

Awareness meditation is the way worked for me, may be you too find it suitable otherwise Dynamic meditation is for most of the people. There are 110 other meditation techniques discovered by Indian Mystic Gorakhnath about 500years before and further modified by Osho that one can experiment and the suitable one could be practiced in routine life.

Osho International Online (OIO) provides facility to learn these from your home,

1. through Osho Meditation Day @€20.00 per person. OIO rotate times through three timezones NY,Berlin and Mumbai. You can prebook according to the convenient time for you.

2. There is OSHO Evening Meeting streaming which can be accessed every day at local time starting 6:40 pm (of which Osho says that he wants his people to view it all over the world and these days it is possible) and 16 of the meditations mostly with video instructions and so much more on iOSHOthrough App.

3. There is a 7 days Free Trial also for people who would like to first try it out.

This is an opportunity for learning and knowing Osho through these sannyasins who lived in his presence and brought to life his words in best possible quality in all formats.

Disciples of Jesus left him alone in last minutes but Osho’s disciples remained with him till he left his body willingly after working, till last day, for all of us to get enlightened. Jesus tried hard till last minute, before being caught, to teach meditation to his disciples. As per Saint John’s Gospel:- Jesus used word ‘Sit’ to transfer his meditative energy to them and went on to pray God, but on returning he found them sleeping. He tried two times again but in vain.

Even today Zen people use word ‘Sit’ for meditation in their saying ‘Sit silently, do nothing, season comes and the grass grows by itself green’.

Hi ….. I write my comments from my personal experiences of my inner journey. This post may include teachings of Mystics around the world that I found worth following even today. For more about me and to connect with me on social media platforms, have a look at my linktree website for connecting with my social media links, or subscribe my YouTube channel and/or listen to the podcasts etc.

#OshoNews #ओश #Spirituality #Philosophy #mindfulness #psychology #Osho #meditation

0 views0 comments