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  • sandeep kumar verma

इस चक्की पर खाते चक्कर, मेरा तन-मन जीवन जर्जर.

Photo by Mochammad Algi on Pexels.com

इसी से सम्बंधित मेरा पोस्ट Medium पर.

इस चक्की पर खाते चक्कर.

मेरा तन-मन, जीवन जर्जर

हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को

और न अब हैरान करो,

अब मत मेरा निर्माण करो।

ये लाइनें वही मिट्टी बोल सकतीं है जो चक्की पर से छिटक कर बाहर गिर पड़ी हैं, या वे व्यक्ति जो आत्मज्ञान को प्राप्त हो चुके हैं। जो व्यक्ति अभी आत्मज्ञान को प्राप्त भी नहीं हुआ है लेकिन ज्ञानियों की भाषा सीख ली है अतः लोग जीवन मरण के चक्कर की बातें करते है जबकि खुद भी इस चक्की पर घूम रहे हैं।

ओशो की किताब “अष्टावक्र महागीता, भाग चार – Ashtavakra Mahageeta, Vol. 4: युग बीते पर सत्य न बीता, सब हारा पर सत्य न हारा (Hindi Edition)” by Osho से साभार

“तीसरा प्रश्न: ओशो,

आपसे संबंधित होने के लिए क्या संन्यास अनिवार्य है? मैंने अभी संन्यास नहीं लिया है और न व्यक्तिगत रूप से आपसे मिला ही हूं। फिर भी आपके प्रति अजीब अनुभूतियों से भर जाता हूं; कभी रोता हूं और कभी आपको निहारता ही रह जाता हूं। ओशो, ऐसा क्यों होता है? और यह कि मैं क्या करूं? पहली बात, पूछा है: ‘आपसे संबंधित होने के लिए क्या संन्यास अनिवार्य है?’

ओशो:- यह ऐसे ही पूछना है, जैसे कोई पूछे कि क्या आपसे संबंधित होने के लिए संबंधित होना अनिवार्य है?

संन्यास तो केवल ढंग है, बहाना है संबंधित होने का। यह तो एक उपाय है संबंधित होने का।

किसी व्यक्ति का हाथ आप अपने हाथ में ले लेते हैं, तो क्या हम पूछते हैं कि प्रेम प्रगट करने के लिए क्या हाथ में हाथ लेना अनिवार्य है?

किसी को हम छाती से लगा लेते हैं, तो क्या हम पूछते हैं कि क्या प्रेम के होने के लिए छाती से लगाना अनिवार्य है? अनिवार्य तो नहीं है। प्रेम तो बिना छाती से लगाए भी हो सकता है। लेकिन जब प्रेम हो, तो बिना छाती से लगाए रह सकोगे?

फिर से सुनो। प्रेम तो हाथ हाथ में पकड़े बिना भी हो सकता है। लेकिन जब प्रेम होगा, तो हाथ हाथ में लिए बिना रह सकोगे? साथ साथ आते हैं। अभिव्यक्तियां हैं।

जिससे तुम्हें प्रेम है, उसके पास कुछ भेंट ले जाते हो – फूल ही सही, फूल नहीं तो फूल की पांखुरी ही सही। क्या प्रेम के लिए भेंट ले जाना अनिवार्य है? जरा भी नहीं। लेकिन जब प्रेम होता है तो देने का भाव होता है।

संन्यास क्या है? संन्यास है इस बात की घोषणा कि मैं अपने को देने को तैयार हूं! संन्यास है इस बात की घोषणा कि आप मेरा हाथ अपने हाथ में ले लो! संन्यास है इस बात की घोषणा कि आप अगर हाथ मेरा अपने हाथ में लोगे, तो मैं छुड़ा कर भागूंगा नहीं। संन्यास तो केवल एक भाव-भंगिमा है – और बड़ी बहुमूल्य है। मैं आपके संग-साथ हूं, आप भी मेरे संग-साथ रहना – इस बात की एक आंतरिक अभिव्यक्ति है।…संन्यास मेरे लिए कोई उदास बात नहीं है।

संन्यास तो हंसता-फूलता, आनंद-मग्न, जीवन का एक नया वितान, एक नया विकास है। तुम बंद हो, कुंद हो, छोटे हो, पड़े हो कारागृह में – शरीर के, मन के! संन्यास तो इस बात की खबर है कि पूरा आकाश तुम्हारा, सब तुम्हारा! भोगो! जागो! यह जो रस बरस रहा है जगत में, यह तुम्हारा है, तुम्हारे लिए बरस रहा है। ये चांद-तारे तुम्हारे लिए चलते हैं। ये फूल तुम्हारे लिए खिलते हैं! तुम इन्हें भोगो! तुम इस रस में डूबो।

अगर प्रेम का मार्ग पकड़ो, तो भोगो। अगर ज्ञान का मार्ग पकड़ो, तो जागो। दोनों सही हैं, दोनों पहुंचा देते हैं। और मेरे संन्यासियों में दोनों तरह के संन्यासी हैं। वस्तुतः मेरा संन्यास कोई संप्रदाय नहीं है।

सारे जगत के धर्मों से लोग आए हैं। ऐसी घटना कभी पृथ्वी पर घटी नहीं है। तुम ऐसा कोई स्थान न पा सकोगे जहां तुम्हें हिंदू मिल जाएं, मुसलमान मिल जाएं, ईसाई मिल जाएं, यहूदी मिल जाएं, बौद्ध मिल जाएं, जैन मिल जाएं, सिक्ख मिल जाएं, पारसी मिल जाएं; और जहां आकर सबने अपनी जीवन-धारा को एक गंगा में डुबा लिया है; जहां कुछ भेद नहीं – ऐसी सार्वभौमता! और यहां कोई सार्वभौमता की बात नहीं कर रहा है और यहां कोई सर्व- धर्म-समन्वय की बकवास नहीं कर रहा है। कोई समझा नहीं रहा है कि ‘अल्ला ईश्वर तेरे नाम’ रटो, ‘अल्ला ईश्वर तेरे नाम!’ कोई समझा नहीं रहा है। इसकी कोई बात ही क्या उठानी, यह बात ही बेहूदी है।

जिस दिन तुमने कहा अल्ला ईश्वर तेरे नाम, उस दिन तुमने मान ही लिया कि दो नाम विपरीत हैं, तुम मिलाने की राजनीति बिठा रहे हो। मान ही लिया कि भिन्न हैं।

यहां कोई समझा नहीं रहा है कि अल्ला ईश्वर तेरे नाम। यहां तो अनजाने अनायास ही यह घटना घट रही है। अल्ला पुकारो तो, ईश्वर पुकारो तो – एक ही को तुम पुकार रहे हो। और इसकी कोई चेष्टा नहीं है। चकित होते हैं लोग जब पहली दफा आते हैं। देख कर हैरान हो जाते हैं कि मुसलमान भी गैरिक वस्त्रों में! ‘कृष्ण मुहम्मद’ को देखा? ‘राधा मुहम्मद’ को देखा? एक सज्जन मुझसे आकर बोले कि राधा हिंदू है कि मुसलमान? मैंने कहा, क्या करना है? राधा राधा है, हिंदू-मुसलमान से क्या लेना-देना? नहीं, उन्होंने कहा, नाम से तो हिंदू लगती है, लेकिन कृष्ण मुहम्मद के साथ जाते देखी।यूं कृष्ण मुहम्मद की पत्नी है वह। कृष्ण मुहम्मद हो गए हैं! फासले बिना किसी के गिराए, बिना किसी की चेष्टा के, बिना किसी तालमेल बिठाने का उपाय किए, अपने-आप घट रही है बात। अपने-आप जब घटती है तो उसका मूल्य बहुत है, उसका सौंदर्य अनूठा, उसमें एक प्रसाद होता है।

ऐसा संन्यास पृथ्वी पर पहले कभी घटा नहीं। तुम एक अनूठे सौभाग्य से गुजर रहे हो। समझोगे, तो चूकोगे नहीं। नहीं समझे, तो पीछे बहुत पछताओगे।

तुम एक अनूठे स्रोत के करीब हो जहां से बड़ी धाराएं निकलेंगी – गंगोत्री के करीब हो। पीछे बहुत पछताओगे। पीछे गंगा बहुत बड़ी हो जाएगी। सागर पहुंचते-पहुंचते सागर जैसी बड़ी हो जाएगी। लेकिन अभी गोमुख से जल गिर रहा है, अभी गंगोत्री पर है। अभी जिन्होंने इस जल को पी लिया, फिर दुबारा नहीं ऐसा मौका मिलेगा।

फिर काशी में भी गंगा है, लेकिन फिर गंदी बहुत हो गई है। फिर न मालूम कितने नाले आ गिरे। गंगोत्री पर जो मजा है, जो स्वच्छता है, फिर दुबारा नहीं। तो जितने जल्दी तुम संन्यास ले सको उतना शुभ है। यह संन्यास की गंगा तो बड़ी होगी – यह पूरी पृथ्वी को घेरेगी। ये गैरिक वस्त्र अब कहीं एक जगह रुकने वाले नहीं हैं – ये सारी पृथ्वी को घेरेंगे। पीछे तुम आओगे – कहीं प्रयाग में, काशी में – तुम्हारी मर्जी है। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, अभी गंगोत्री पर आ जाओ तो अच्छा है।

“अभी स्रोत के करीब हो तुम। यह स्रोत गंगा बनेगा। अभी गंगोत्री में शायद तुम पहचान भी न पाओ। पीछे तुम पछताओगे। तो अगर ऐसी सौभाग्य की किरण तुम्हारे भीतर उठी हो कि भाव उठता हो कि डूब लें, मस्त हों लें – तो रुको मत! लाख भय हों, किनारे सरका कर उतर जाओ। और भय मिटते ही हैं, जब तुम उन्हें सरका कर आगे बढ़ते हो, अन्यथा वे कभी मिटते नहीं।

दाना तू, खेती भी तू,

बारां भी तू, हासिल भी तू।

राह तू, रहरव भी तू,

रहबर भी तू, मंजिल भी तू।

नाखुदा तू, डेहर तू,

कश्ती भी तू, साहिल भी तू।

मय भी तू, मीना भी तू,

साकी भी तू, महफिल भी तू।

यहां तो कुछ और तुम्हें थोड़े ही सिखा रहा हूं। संन्यास यानी तुम्हारी याद तुम्हें दिलानी है। और तुम सब कुछ हो।

मय भी तू, मीना भी तू।

साकी भी तू, महफिल भी तू।

मेरे पास सिर्फ तुम्हें वही दे देना है जो तुम्हारे पास है ही। मैं तुम्हें वही देना चाहता हूं जो तुम्हारे पास है। जो तुम लिए बैठे हो, और भूल गए हो और जिसका तुम्हें विस्मरण हो गया है। तुम्हें तुम्हारा स्मरण दिला देना है। संन्यास उस स्मरण की तरफ एक व्यवस्थित प्रक्रिया है।

इस चक्की पर खाते चक्कर

मेरा तन-मन, जीवन जर्जर

हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को

और न अब हैरान करो,

अब मत मेरा निर्माण करो! संन्यास इस बात की घोषणा है कि हे प्रभु! बहुत चक्कर हो गए इस चाक पर। इस चक्की पर खाते चक्कर

मेरा तन-मन, जीवन जर्जर

हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को

और न अब हैरान करो,

अब मत मेरा निर्माण करो।

इस अंधेरी रात से जागना है – तो संन्यास! इस दुख भरे नर्क से बाहर निकलना है – तो संन्यास। सुबह को पास लाना है – तो संन्यास। जीवन को परमात्मा की सुगंध से भरना है – तो संन्यास। संन्यास का अर्थ है: तुमने तैयारी दिखला दी कि तुम मंदिर बनने को तैयार हो, अब परमात्मा की मौज हो तो आ विराजे तुम्हारे हृदय में।”